अछूत

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सिल्ली बाहर अपनी गुड़िया से खेलने मे मगन थी तभी जानकी काकी की तेज आवाज गूँजी सिल्ली आ खाना ले जा ….जानकी काकी सिल्ली के पड़ोस मे ही रहती थी दोनो थी भी एक ही जाति की पर दोनो मे जमीन आसमान का फर्क भी था । जानकी काकी का बड़ा सा मकान और रईसो जैसी जिंदगी थी उनके बच्चे शहर में अच्छी जगह नौकरी करते थे और काका गाँव के प्रधान थे ,खूब रूतबा था काकी और काका का …..सिल्ली का घर किसी खंडहर से कम नही था उसकी माँ जानकी काकी के घर के काम निबटाती तो बापू काका की सेवा मे हमेशा तत्पर मिलते …पर सिल्ली को काकी के घर मे ठिठकने का भी मौका नही मिलता ..कभी छोटे मोटे काम काकी बता देती तो उन्हे करने के बहाने सिल्ली घर की शानोशौकत निहार के खुश हो जाती उसका वहाँ जाने से मन नही होता पर काकी की डाँट के डर से वो अपने घर के बाहर माँ के इंतजार मे डेरा जमाकर बैठ जाती। दस साल की सिल्ली स्कूल नही जाती थी पर माँ ने उसे सलीका बहुत सिखा दिया था , माँ के घर पर न रहने पर वो छोटे मोटे काम निबटा देती जिससे माँ को आकर परेशान न होना पड़े।
सिल्ली अरी ओ सिल्ली कहाँ मर गई , इस लड़की को सुनाई भी कम देता है ,कब से आवाजें लगा रही हूँ..जानकी काकी का स्वर कठोर हो गया ….आई काकी सिल्ली अपनी थाली लेकर अगले ही पल काकी के सामने खड़ी थी। काकी गुस्से से घूरते हुए ..ले कल की रोटियाँ और  सब्जी बच गयी थी ,ले जा । सिल्ली सिर झुकाये अपनी थाली आगे करके खड़ी हो गई ……काकी ने दूर से ही सब्जी और रोटी लगभग फेकते हुए सिल्ली की थाली मे डालते हुए फिर डाँट लगाई दूर खड़ी रहा कर जब देखो छूने की फिराक मे रहती है । अब खड़ी क्या है जा या हलवा पूरी के इंतजार मे है …सिल्ली चुपचाप वापस चली गयी …..रात को माँ के साथ बैठी सिल्ली पूँछ रही थी …अम्मा तुम तो काकी के बर्तन धुलती हो , कपड़े धुलती हो , साफ सफाई करती हो और बापू काका की चाकरी करते हैं , काकी तुम्हारे धुले कपड़े पहनती है , धुले बर्तन मे खाना खाती है फिर काकी हमको छूती काहे नही है, काहे हमको पास जाने पर दुत्कार देती है …………….अरे बेटा काकी पूजा पाठ करती है न और हम लोग दिन भर कूड़ा करकट करते हैं इसलिए वो  हमको छूती नही है ….सिल्ली माँ के जवाब से संतुष्ट हो सो चुकी थी और माँ सोच रही रही थी क्या सिर्फ यही कारण है या फिर उसकी गरीबी ही उसे अछूत बना रही है ……..

Vibha

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